"एक व्यक्ति, एक वोट" की लड़ाई में राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के खिलाफ बड़ा हमला बोल दिया है। कांग्रेस नेता का दावा है कि कर्नाटक के महादेवपुरा में 1 लाख से ज्यादा फर्जी वोटर बनाए गए हैं। उन्होंने इसके लिए एक नया वेबसाइट (votechori.in) और हेल्पलाइन (9650003420) लॉन्च किया है। वहीं, चुनाव आयोग ने राहुल से सबूत पेश करने या माफी मांगने का आदेश दिया है। यह जंग अब संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता के सवाल पर पहुंच गई है।
क्या है पूरा मामला?
राहुल गांधी ने 7 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़ा दावा किया था। उनके मुताबिक, बैंगलोर के महादेवपुरा इलाके में 1,00,250 फर्जी वोटर बनाए गए हैं। इनमें से 11,965 वोटर एक ही नाम से अलग-अलग राज्यों में रजिस्टर्ड हैं। कुछ जगहों पर तो 80 लोगों को एक ही छोटे से कमरे (120 स्क्वायर फीट) का पता दिखाया गया है। राहुल का आरोप है कि फॉर्म 6 का गलत इस्तेमाल करके ये फर्जी वोटर जोड़े गए हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए राहुल से सबूत मांगे हैं। आयोग का कहना है कि अगर सबूत नहीं दिखा सकते तो माफी मांगें।
कैसे बढ़ी टेंशन?
पहले चुनाव आयोग ने राहुल गांधी को 9 अगस्त तक का समय दिया था। लेकिन राहुल ने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बजाय उन्होंने 10 अगस्त को 'वोट चोरी एक्सपोज्ड' नाम से नया अभियान शुरू कर दिया। इसमें लोगों से अपील की गई कि वो डिजिटल वोटर लिस्ट की मांग के लिए आवाज उठाएं। कांग्रेस ने खास वेबसाइट और टोल-फ्री नंबर भी लॉन्च किया है। जो लोग इस मुहिम से जुड़ते हैं, उन्हें खरगे, वेणुगोपाल और माकेन जैसे नेताओं के साइन वाला डिजिटल सर्टिफिकेट दिया जा रहा है। राहुल का कहना है कि वो संसद में संविधान की शपथ ले चुके हैं और झूठे दावे नहीं कर रहे।
अब क्या होगा आगे?
कर्नाटक कांग्रेस ने कहा है कि वो चुनाव आयोग में राहुल गांधी की तरफ से शिकायत दर्ज कराएगी। वहीं, NCP के शरद पवार ने राहुल का समर्थन करते हुए बताया कि उन्हें भी 160 सीटें 'गारंटी' से जीतने का ऑफर मिला था। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर कुछ दिन पहले वोटर लिस्ट डाउनलोड करने में दिक्कत आई थी, जिस पर सवाल उठे हैं। अब देखना है कि चुनाव आयोग राहुल के सामने रखे सबूतों पर क्या एक्शन लेता है। यह मामला अब सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है।
यह केस अब सिर्फ राहुल गांधी और चुनाव आयोग के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है। यह पूरे देश के लोकतंत्र की परख का मामला बन चुका है। एक तरफ जहां विपक्ष डिजिटल वोटर लिस्ट की मांग कर रहा है, वहीं सरकार इसे राजनीतिक रंगदारी बता रही है। आने वाले दिनों में यह विवाद और गर्मा सकता है, खासकर बिहार में चुनावी तैयारियों के बीच। अब सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग पारदर्शिता दिखाते हुए 10 साल के वोटर डाटा को सार्वजनिक करेगा? या फिर यह मामला कोर्ट तक पहुंचेगा? जवाब अभी बाकी है...
